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Afghanistan-Pakistan Relation: अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सम्बन्ध

 अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव के मुख्य कारण

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव लंबे समय से चला आ रहा है। इसके कई कारण हैं, जिनमें ऐतिहासिक संदर्भ, सीमा विवाद, आतंकवाद और क्षेत्रीय प्रभाव शामिल हैं। इसके अलावा पाकिस्तान ने अमेरिकन डॉलर के लालच में अफगानिस्तान को सदेव धोखा दिया और उन्हें सिर्फ यूज़ किया |जब रूस ने अफगानिस्तान में एक तरह से सेना भेज कर अपनी कठ्मुल्लाह सरकार स्थापित कर दी तब अमेरिका चिंतित हो उठा और उसने पाकिस्तान की मदद दोनों हाथो से पैसे लुटा , पाकिस्तान को  डॉलर दे कर उसने पाकिस्तान की शह पर अफगानिस्तान के वॉर लॉर्ड्स का उपयोग  किया और रूस आर्मी को घुटने पर ला दिया|

उसी समय 9/11 घटना घटित हो गयी ,अमेरिका ने उस घटना के जिम्मेदार ओसामा बिन लादेन को माना और जैसे ही उसे पता चला की लादेन ने अपना अड्डा अफगानिस्तान को बना लिया है और वोह अल जवाहरी और अपने समर्थको  के साथ अफगानिस्तान मे छुप गया है तो अमेरिका ने अपनी फ़ौज अफगानिस्तान   भेज दिया  इसका नतीजा निकला रक्तपात |इस सबका फायदा उठाया पाकिस्तान ने उसने अमेरिका से अरबो डॉलर लिए और उनके फ़ौज ने सारे हजम कर लिए |

ऐतिहासिक संदर्भ

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक संदर्भ जटिल हैं। दोनों देशों ने अफगान-अंग्रेज युद्धों और ब्रिटिश भारत के विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पाकिस्तान के निर्माण ने अफगानिस्तान के लिए कई समस्याएँ पैदा कीं, जिनमें पश्तून अलगाववाद और सीमा विवाद शामिल हैं।
आइये विस्तार से बात करते है :-

नमस्कार दोस्तों मेरे युटुब मंच पर आप सभी का स्वागत है, आज हम बात करेंगे  तालिबान की, तालिबान को और अफगानिस्तान को समझने से पहले हमें सबसे जो जरूरी चीज है यह  जानना  की  की अफगानिस्तान की जो सोसाइटी है उसकी डेमोग्राफी कैसी है? मित्रों, अगर हम ध्यान से देखें तो अफगानिस्तान में एक बड़ी खास  चीज हमें देखने को मिलती है और वो ये है की उसकी जो वेस्टर्न टेरिटरी है वहां पर जो लोग रहते हैं वह बेसिकली उनको कहते हैं हजारा और अफगानिस्तान की जो नॉर्दर्न टेरिटरी है, नॉर्दर्न टेरिटरी में जो लोग रहते हैं उनको हम कहते हैं ताजिक, दिलचस्प बात यह है की जो अफगानिस्तान  की  सदन और पूर्वी टेरिटरी है वहां पर जो लोग रहते हैं उनको हम कहते हैं पश्तून  और जो पश्तून  है अफगानिस्तान के वो बड़े पेक्युलयर लोग हैं वै मुस्लिम हैं  ये पहले थे हिंदू और बाद मे बुद्ध बने; जब मुस्लिम आतताई ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया और वहाँ के लोगो पर अत्याचार किया तो वोह मुस्लिम मजहब में कन्वर्ट हो वे मुस्लिम बन गए | 



आज अफगानिस्तान एक मुस्लिम कंट्री यानि इस्लामिक कंट्री है और देबबंद का अनुसरण करते है|  मित्रो, देबबंद इस्लाम जो है उसका उद्गम स्थान इंडिया में सहारनपुर है| इस कारण इनका रिश्ता इंडिया से अच्छा है| बहुत सारे लोगों ने इतिहास में अफगानिस्तान के ऊपर कब्जा करने की कंट्रोल करने की कोशिश करी हम इतिहास में बहुत ज्यादा नहीं जाएंगे हम मॉडर्न टाइम्स में इस ऑपरेशन के पर्सपेक्टिव सी चीजों को देखेंगे| मित्रो , ब्रिटिश एक ऐसे बड़े प्लेयर थे जो की अफगानिस्तान में कंट्रोल पाना चाहते थे अब ब्रिटिशर्स अफगानिस्तान में कंट्रोल इसलिए भी पाना चाहते थे क्योंकि उनका एक ऑब्जेक्टिव ये था की वो रूस  को अफगानिस्तान में आने से रोकना चाहते थे|

 सबसे बड़ा सवाल ये उठाता है की रूस  अफगानिस्तान में आना क्यों चाहता था इस बीच में एक लड़ाई हुई यह लड़ाई पेनिनसुला के रीजन में इसलिए इसको क्रीमिया वार्स  के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह क्रीमियन वॉर जब हुई तो उस समय रसिया बुरी तरह से ब्रिटेन के हाथों हार गया, युद्ध जब खत्म हुआ और रूस ने हार के कारण को जाना तो उसने जाना ब्रिटेन इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन से गुजर रहा था | रूस को ये मालूम चला उनकी हार सबसे बड़ा कारण था की उन लोगो तो इंडस्ट्रियलिज्म के फील्ड  में कोई डेवलपमेंट की ही नहीं थी| रूस ने यह जाना की हमारे पास तो मॉडर्न इंडस्ट्री नाम की कोई चीज ही नहीं थी, ना उनके पास मॉडर्न आर्म्स थे ना ही मॉडर्न कारतूस|

 उन्होंने समझा  ब्रिटिशर्स के सामने आगे घुटने नहीं टेकने तो उन्होंने  इंडस्ट्रियलिज्म करनी होगी उसने सेंट्रल एशिया को फोकस किया अपने रिसोर्स का बेहतर इस्तेमाल किया  और जब रूस सेंट्रल एशिया की टेरिटरी में आना चालू हुआ तो उसे समय ब्रिटिश इंडिया में थे और रूस की हर गतिविधि को चेक कर रहे थे| ब्रिटिशर्स ने डिसाइड किया की वोह अफगानिस्तान जाएंगे और  अफगानिस्तान को एक बफर बनाएंगे और रूस को सेंट्रल एशिया से आगे बढ़ने से रोकेंगे |

Afghanistan-Pakistan Relation
Taliban
अब, जब ब्रिटिशर्स उठ के अफगानिस्तान गए तो वहां पर जाकर उनका युद्ध अफगानों के साथ हो गया, युद्ध बड़ा भीषण था तो  अफ़गानियों ने  ब्रिटिश को बहुत बुरी तरह हरा दिया | अब ब्रिटिश ने अफगानिस्तान पर नजर रखने  को उन्होंने अफगानिस्तान को डिवाइड कर दिया और एक बॉर्डर बना के और उस बॉर्डर का नाम रखा डूरंड लाइन, मित्रो, डूरंड लाइन उस समय साउथ और ईस्ट अफगानिस्तान की तरफ को बनी यानि ब्रिटिश इंडिया की तरफ को बनी और उन्होंने उस समय यह लाइन बनाने के समय पश्तून  जो साउथ ईस्ट वाले एरिया में अफगानिस्तान के रहते थे उनको एक तरीके से डिवाइड कर दिया लेकिन  पश्तूनो ने कभी  इस लाइन को एक्सेप्ट नहीं किया|

 अफगानी आज तक इस डूरंड लाइन को अपना बॉर्डर नहीं मानते ध्यान दीजिएगा| यह मत भूलिएगा की जब रसिया सेंटर एशिया में दबदबा बना चुका था| 1920 में भी अफगानिस्तान के और सोवियत यूनियन के रिश्ते एक दूसरे के साथ क्लोज हो गए तो यह रिश्ते कोई नए नहीं थे यह 1920 से एक दूसरे के साथ थे| 1947 में ब्रिटिश ने इंडिया और पाकिस्तान का बंटवारा कर दिया और ब्रिटिशर्स ने इंडिया पाकिस्तान का बंटवारा करके हम दोनों देश को छोड़कर चले गए| 

जो डूरंड लाइन बनी थी जो की पहले ब्रिटिश इंडिया और अफगानिस्तान के बीच में बॉर्डर थी, 1947 में यही लाइन अब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच में बॉर्डर बन गई जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच में बॉर्डर बनी तो उस समय यह हुआ की अफगानिस्तान में जो किंग जाहिर शाह  थे उन्होंने तुरंत पाकिस्तान को बोला की ये डूरंड लाइन को तो हम नहीं मानते पर पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की इस बात को मानने से साफ़ इंकार कर दिया इस घटना से इन दोनों देशो के रिश्ते में खटास पैदा हो गई और एक घटना और हुई बलूचिस्तान 1947 के बाद पाकिस्तान के हिस्से में आ गया वहाँ भी पश्तून काफी अधिक रहते थे|

 चुकीं जाहिर शाह काफी वृद्ध हो चुके थे और वो बार-बार अपना मेडिकल ट्रीटमेंट करने के लिए  यूरोप जाया  करते थे, 1970 मे जब किंग एक बार अपना ट्रीटमेंट करने के लिए यूरोप गए तो आर्मी का एक अधिकारी था जिसका नाम था मोहम्मद दौड़ उसने बगावत कर दी और किंग को कह दिया की उसे अफगानिस्तान  आने की जरूरत नहीं| उसने जाहिर शाह को हटा दिया  1970 में तो मोहम्मद दौड़ को भी सोवियत बैंकिंग भी मिली| मोहम्मद दौड़ ने गद्दी सँभालते ही कह दिया की अफ़ग़ानिस्तान मॉडर्न मुल्क बनेगा इस  बात को बोलने की वजह से अफगानिस्तान में बहुत खलबली मैच गई क्योंकि दौड़ ने पहले अफगानिस्तान की जनता को  बताया था की अफगानिस्तान को  इस्लामिक कंट्री बनाऊंगा|

अफगानिस्तान में उस समय कई इस्लामिस्ट लीडर कौन थे? 

तीन इस्लामिस्ट लीडर उस वक्त काफी मजबूत थे, वे थे नूरदीन रब्बानी दूसरा तक गुलबदीन हिकमयतयार और तीसरा अहमद शाह मसूद| यह तीन लीडर्स जो की इस्लामिक थे को मोहम्मद  दौड़ ने उन्हें साफ़ कह दिया की अफगानिस्तान में अगर आपको रहना है तो आपको मेरी बात माननी पड़ेगी नहीं तो आप अफगानिस्तान छोड़ सकते हैं और यही हुआ वे  1974 में अफ्गानिस्तान छोड़कर पाकिस्तान चले गए| आई एस आई ने मौके का फायदा उठाया, इन तीनों लोगों को बॉर्डर से तुरंत इस्लामाबाद ले गए और उनका प्लान था की तीनो की हेल्प से वे अफ़ग़ान  ट्राईबल लोगों को इकट्ठा करके उनको मोहम्मद दौड़ के खिलाफ लड़वाएंगे और वही हुआ| अमेरिका भी रूस की अफगानिस्तान से नजदीकीयों से बड़ा परेशां था,पाकिस्तान ने उसे रूस के खिलाफ उसे बढ़िया मौका दिला दिया था|

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अमेरिका चाहता था की वोह रूस को अफगानिस्तान में लाकर उसे भारी  नुकसान पहुंचाए| उसने अपने प्लान में पाकिस्तान को शामिल किया, डॉलर के लालच में और जायदा स्ट्रेटेजिक डेफ पाने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका से हाथ मिला लिया,वह तो ऐसे मौके की तलाश में ही था | उन्होंने अफगानियो को रेडिकल ट्रेनिंग दी और पैसा,बारूद देकर अफगानिस्तान भेजा|

 उनका प्लान था की अफगानी मुजाहिद को मोहम्मद दौड़ के खिलाफ इतना लड़वाएंगे की मोहम्मद दौड़ को हटाकर सोवियत खुद लड़ने आ जाए| सऊदी अरब को अमेरिका ने यूज़ किया उसने पाकिस्तान में मदरसे की भीड़ लगा दी जहाँ अफगान मुजाहिद को वहाबी इस्लाम की सिक्षा दी गई और उन्हें कट्टर बनाया गया| पेशावर, क्वेटा वाले पूरे इलाके जो अफगानिस्तान के बाउंड्री के पास थे वहां मुजाहिद ट्रेनिंग लेते थे; रेडिकल ट्रेनिंग के बाद यह लड़के पैसा लेकर ट्रेनिंग लेकर वापस जाते हैं अफगानिस्तान में और अफगानिस्तान में जाकर पहले मोहम्मद दौड़ के खिलाफ लड़ते थे|

जब रूस ने यह देखा  की अफगान फ़ौज अफगान लड़ाको का सामना नहीं कर पा रही तो वोह अफगानिस्तान पहुँच जाता है और डायरेक्ट युद्ध मे शामिल हो जाता है | अमेरिका तो चाहता ही यही था की सोवियत खुद डायरेक्टली युद्ध मे इन्वोल्व हो जाए और सोवियत संघ बहुत बड़ी गलती कर बैठता है| उसे समय सऊदी अरब दो बड़े महत्वपूर्ण लोगों को भेजता है उसमें से एक महत्वपूर्ण आदमी है जिसका नाम है प्रोफेसर अब्दुल्ला इनके साथ आता है इनका स्टूडेंट जिसका नाम है ओसामा बिन लादेन ओसामा बिन लादेन तो ये दोनों मिल के अफगानिस्तान से लड़कों को ट्रेन करने के लिए पाकिस्तान में आते हैं अब यह जब दोनों यहां पर आते हैं तो उसे समय ओसामा बिन लादेन एक बड़े करिश्माई लीडर होते हैं तो वह उसे समय बहुत अच्छी एग्रेसिव ट्रेनिंग देते हैं इसकी वजह से ओसामा बिन लादेन का एक टीचर/लीडर  बन जाता है और उस वक़्त   इजिप्ट से एक आदमी जवाहरी जो मेडिकल सर्जन था वोह ओसामा की टीम को ज्वाइन करता है, अब पाकिस्तान भी अपना पहला टेररिस्ट भेजता है वह था हाफिज सईद जो आज खतरनाक उग्रवादी ग्रुप लश्कर तोइबा का हेड है|

To be Continued.........................

 

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